Baba Ramdevji के जन्म से जुडी कहानी
नमस्कार दोस्तों जय श्री रामदेव जी की।
आज के इस आर्टिकल में हम जानेंगे बाबा रामदेव जी जिन्हें ramsapir के नाम से पूरी दुनिया में पूजा जाता है उनके जन्म से जुड़ी कथा का विस्तार से वर्णन करेंगे।
यह आर्टिकल baba ramdevji के वंशज ठाकुर महेंद्र सिंह तंवर के द्वारा संपादित किया गया है।
इसका मुख्य उद्देश्य बाबा के भक्तों तक सही जानकारी को पहुंचाना तथा अन्य किसी भी प्रकार की भ्रांति को मिटाना है।
जय श्री रामदेव जी की।
Baba ramdevji के जन्म से पूर्व की कथा का वर्णन अगले अंतरे में स्पष्ट किया गया है।

अजमाल जी और कुंभेश्वर महाराज
रामदेवजी के पिता अजमाल जी महाराज के राज्य में काफी समय से बरसात नहीं हुई |और वहा अकाल जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई थी। गांव के लोग तथा कुंभेश्वर महाराज के द्वारा अजमाल जी को बाजिया तथा अन्य नामों से संबोधित करना प्रारंभ कर दिया था। इसका मुख्य कारण यह बताया जाता है कि उस समय तक बाबा ramdevji के पिता अजमाल जी के कोई भी संतान नहीं थी।
प्राचीन प्रथाओं के अनुसार जनता की कुरीति उस समय काफी ज्यादा प्रचलित थी लोग अजमाल जी का मुख देखना भी पसंद नहीं करते थे इससे परेशान होकर अजमाल जी अपने गुरु कुंभेश्वर महाराज के पास गए । कुंभेश्वर महाराज आदिशक्ति को पूजते थे तथा उन्हीं को सब कुछ मानते थे। जिसके कारण वे अपनी देवी के अलावा किसी और भगवान की आराधना नहीं करते थे।
अजमाल जी अपने दुख तथा प्रजा के दुख को कुंभेश्वर महाराज को बताते हैं कि उनके नगर मैं अकाल पड़ गया है कहीं पर भी पानी की बूंद देखने को नहीं मिल रही है इस पर कुंबेश्वर जी कहते हैं कि तेरे जैसे नपुसंक के होते हुए महाकाल नहीं पड़ेगा तो सुकाल पड़ेगा।
ramsapir के पिता अजमाल जी कहते हैं इसमें मेरा क्या दोष ? पुत्र प्राप्ति के लिए मैंने क्या- क्या नहीं किया मैंने जप ,तप पूजा ,व्रत तथा यज्ञ इत्यादि के लिए सभी सुख तक त्याग दिए हैं। मैं और पुत्र रत्न की प्राप्ति हेतु और क्या करूं आप ही इसका उपाय बताइए।
यह सुनकर कुंभेश्वर महाराज कहते हैं कि राजन नपुसंकता का भी चेहरा देखना भी पाप है जिस कारण तेरे साथ साथ तेरी प्रजा भी दुख पा रही हैं। उपाय के चेष्टा के अनुरूप अजमाल जी कुंभेश्वर महाराज की बातों का स्मरण करते हुए उन्हें उपाय के बारे में वापिस पूछते हैं। कुंभेश्वर महाराज कहते हैं कि उपाय मैं क्यों बताऊं आप पूजा करो द्वारिका नाथ रे और उपाय यह शक्ति का भक्त बताएं।
घमंड में चूर कुंभेश्वर महाराज बिना किसी लज्जा के अजमाल जी को यह जवाब देते हैं और कहते हैं कि जाओ राजन आप इसका उपाय आपके द्वारिकाधीश से ही क्यों नहीं मांगते । यह सुनकर अजमाल जी कहते हैं कि ठीक है अब इसका उपाय द्वारिका नाथ ही बताएंगे नहीं तो मैं समुद्र में कूदकर अपनी जान दे दूंगा ।
Dwarkadhish मंदिर और अजमाल जी
कुंभेश्वर महाराज से किसी भी प्रकार के उपाय को नहीं पाकर अजमाल जी द्वारिका चले जाते हैं जोकि वर्तमान में गुजरात में स्थित है । अजमाल जी वहां पर अपने आराध्य dwarkadhish के मंदिर जाते हैं।
मंदिर पहुंचकर अजमाल जी dwarkadhish की मूर्ति के आगे जाकर रोने लगते हैं , और कहते हैं कि मेरी आपकी पूजा आराधना में ऐसी क्या कमी रही , जिसके कारण आप मुझे इतने दुख दिखा रहे हैं । मैंने आपकी सेवा में क्या भूल या चूक कर दी । हे भगवान इसके मुआवजे में आप मुझसे क्या चाहते हैं । आप मुझे तो कष्ट दे ही रहे हैं साथ साथ अकाल से मेरी प्रजा को भी पीड़ित कर रहे हैं dwarkadhish इसका आप हल निकालिए।
अजमाल जी के द्वारा बार-बार लगातार कहने पर द्वारिकाधीश से किसी भी प्रकार के प्रतिउत्तर ना आने पर अजमाल जी क्रोधित हो जाते हैं और वह कहते हैं कि आप अगर मेरी नहीं सुनोगे तो मैं आपकी भक्ति क्यों करूं ।अजमाल जी को मूर्ति से किसी भी प्रकार के जवाब नहीं मिलने पर वह dwarkadhish पर अपशब्दों की बौछार करना प्रारंभ कर देते हैं तथा dwarkadhish के अपमान स्वरूप उनके ऊपर लड्डू की दे मार और यह देख कर वहां पर मंदिर का पुजारी आ जाता है ।

अजमाल जी और पुजारी का संवाद
अजमाल जी के द्वारा द्वारिकाधीश की मूर्ति के साथ किए गए अपमान को देखकर पुजारी अजमाल जी को रोकते हुए कहते हैं कि हे राजन यह क्या अनर्थ कर रहे हो आप ? भगवान श्री द्वारिकाधीश की मूर्ति के साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हो ? इसी के जवाब में अजमाल जी कहते हैं कि यह मेरे प्रश्नों के उत्तर नहीं दे रहे हैं। पुजारी को लगा शायद राजन पागल हो गए हैं इसी कारण वे इस प्रकार की बातें कर रहे हैं।
इसी प्रकार की बातें सुनकर पुजारी कहता है कि द्वारिकाधीश यहां पर कहां होंगे द्वारिकाधीश तो क्षीरसागर में रहते हैं भला उनका यहां क्या काम जो यहां आएंगे। पुजारी की यह बात सुनकर अजमाल जी बिना समय गवाएं क्षीरसागर की ओर बढ़ते हैं और सागर में कूद जाते हैं । और अजमाल जी के अंदर चेष्टा का उत्तम प्रारूप रहता है कि वह द्वारिकाधीश से मिलेंगे। जैसे ही अजमाल जी सागर में कूदते हैं वह धीरे-धीरे पाताल की तरफ बढ़ते जाते हैं और द्वारिकाधीश के चरणों में जा गिरते हैं।
अजमाल जी और द्वारिकाधीश संवाद
कहते हैं ना भक्तों के बस में भगवान हमेशा रहते हैं उसी प्रकार अजमाल जी के आराधना को सुनते हुए श्री द्वारिकाधीश अजमाल जी को दर्शन देते हैं और उनका पथ प्रदर्शित करते हैं। dwarkadhish अजमाल को उठाकर कहते हैं कि उठिए अजमाल जी आपकी परीक्षा पूर्ण हो गई हैं। अजमाल जी द्वारिकाधीश को देखकर आश्चर्यचकित रह जाते हैं और कहते हैं कि हे प्रभु आपके मस्तिष्क पर यह चोट कैसी ? किसका इतना साहस जिसने मेरे प्रभु को चोट पहुंचाने का दुस्साहस किया।
यह सुनकर द्वारिकाधीश मुस्कुराते हुए कहते हैं कि यह तो एक भक्त के प्रेम का प्रसाद है। यह सुनकर अजमालजी समझ जाते हैं कि उनके द्वारा मारे गए लड्डू के कारण ही प्रभु के यह चोट आई हैं। अजमाल जी अपनी भूलवश की गई इस गलती की माफी श्री द्वारिकाधीश से मांगते हैं ।और कहते हैं की प्रभु अपने इस नादान भक्तों को क्षमा कर देना मैंने तो क्रोध में आकर आपकी प्रतिमा पर लड्डू मारा था। मुझे क्या पता था की मेरी इस लड्डू के प्रहार से आपको चोट लग सकती हैं।
द्वारकाधीश अजमाल जी को माफ करते हुए उनके आने का कारण पूछते हैं । dwarkadhish के पूछने पर अजमाल जी कहते हैं कि इतने क्यों नादान बन रहे हैं, आप सब कुछ जानते हैं तथा आप मेरे यहां आने के प्रयोजन से आप भली-भांति परिचित हैं। यह सुनकर dwarkadhish मुस्कुराते हुए कहते हैं हां मैं आपके यहां आने का प्रयोजन अच्छी तरह जानता हूं और मैं यह वरदान देता हूं की मैं स्वयं तुम्हारे घर रामदेव के रूप में जन्म लूंगा। तथा अजमाल जी को अपने अवतरण दिवस के बारे में कहते हैं कि
भादू ये री दूज को जद चंदों करे प्रकाश रामदेव बण आवसू राखि जै विस्वास।
इस लाइन का यह तात्पर्य है कि द्वारकाधीश अजमाल जी को कहते हैं कि भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया को रामदेव के रूप में मैं तुम्हारे घर पर अवतार लूंगा। अजमान जी द्वारकाधीश की वचन से संतुष्ट होकर द्वारकाधीश से पुनः पूछते हैं कि प्रभु मैं ठहरा अज्ञानी तथा नादान प्राणी हूं मुझे आपकी आने का पता कैसे चलेगा।
इस पर द्वारकाधीश कहते हैं की जब मैं तुम्हारे घर पर अवतार लूंगा तब तुम्हारे पूरे महल में कुमकुम के पगलिया बन जाएंगे तथा समस्त महल का जल दूध में परिवर्तित हो जाएगा तब समझ जाना की मैं तुम्हारे घर आ गया हूं।द्वारकाधीश से वचन से संतुष्ट होकर अजमाल जी पर अपने महल चले जाते हैं और द्वारकाधीश की आने की प्रतीक्षा करने लगते हैं।
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baba ramdevji का जन्म
द्वारकाधीश से वचन पाकर अजमाल जी अपने महल वापस आ जाते हैं भाद्रपद मास की दूज की प्रतीक्षा करने लगते हैं। आखिर वह दिन आ ही गया जिस दिन द्वारकाधीश ने ramdevji के रूप में जन्म लेने का वरदान अजमाल जी को किया था।
भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीय को देर रात में द्वारकाधीश अजमान जी के घर ramdevji के रूप में अवतार लेते हैं।
अजमाल जी की पूरे महल में कुमकुम के पद चिन्ह बन जाते हैं तथा संपूर्ण महल में पानी का दूध में परिवर्तन हो जाता है।
साथ ही अजमाल जी की संपूर्ण राज्य में घनघोर बरसात होती हैं जिससे अजमाल जी के राज्य को अकाल से राहत प्राप्त होती है। dwarkadhish का अजमाल जी के घर अपने अंश ramdevji के रूप में जन्म लेने के कारण ramdevji को उनके भक्तों द्वारा द्वारकाधीश के अवतार के नाम से भी पुकारा जाता है।
बाबा रामदेवजी तथा रामदेवरा से सम्बंधित जानकारी हेतु आप संपर्क कर सकते है –
9977886001


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